आभार ‘माँ’

वो मेरी माँ थी।
वो देवलोक से आई थी
ईश्वर के आकाश की एक श्वास बन के आई थी
एक असाधारण व्यक्तित्व
वह शक्ति का एक रूप बन कर आई थी

वो मेरी माँ थी,
जो भी हूँ उनकी बदौलत हूँ
आज मैं गर्वित हूँ हृदय से उपकृत हूँ
माँ, तुमन े मुझे अपनी पुत्री चुना इसके
लिए मैं सदा आपकी आभारी रहूँगी

माँ शब्द अपने में पूर्ण होता है,
उसे किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं होती,
किन्तु म ेरी माँ सदगुणो की ऐसी खान थी
कि जिसके नाम के आगे विशेषण लगाए बिना
माँ के प्रति म ेरी भावों की अभिव्यक्ति अपूर्ण रह जायेगी

मेरी माँ करूणा, संवेदना, ममत्व का सरोवर थी

सादगी की प्रतिमूर्ति ,
समाज की हर पीढ़ा को वो अपना समझवी थी
ऐसी करूणामयी थी मेरी माँ जो देवलोक से आई थी

35 वर्षो तक, अथक मेहनत, व ईमानदारी के साथ
सरकारी समाज-कल्याण केन्द्र में एक
व्तहंदपेवत के रूप में कार्यरत रही
आशारानी वोहरा एक उतम लेखिका ने
उनकी कार्यशैली, जीवनशैली व चरित्र से
प्रभावित हो 1964 की सरिता पत्रिका में
उनपर एक लेख लिखा, जो कि आज भी हमारे लिए गर्व का विषय है

जीवन में सीखना व सिखाना उन्होने
कभी बन्द नहीं किया
संगीत, चित्रकला में निपुण वह
अनेक विषयों की ज्ञाता थी
सिलाई, बुनाई कढ़ाई में दक्षता हासिल
कर छंजपवदंस स्मअमस के पुरस्कार से भी सम्मानित थी,
अनगिनत कन्याओं को उन्होंने ज्तंपद किया
उनका जीवन, संवारा, उन्हें स्वावलम्बी बनाया जो आज भी
स्व. श्रीमती विजय कुमारी भारद्वाज के गुणगान गाती नहीं थकती

मैने कभी भी अपनी माँ को आलस्य में
खाली बैठे नहीं देखा, सदा काम करते देखा,
और कुछ नहीं तो 80 वर्ष की आयु में भी
मशीन लेकर कपड़ो की सिलाई करने लग जाती थी
उनका आदर्श जीवन कर्ममय था
वो सदा कर्म में और कर्म म ें विश्वास किया करती थी
वो कर्म योगिनि थी, देवलोक से आई थी

न झुमके, न झूमर, न टीका, न कुंडल
साहस ही उनका इकलौता गहना था

कितना भी गहन अंधेरा हो
साहस के सूरज को उन्होंने कभी अस्त नहीं होने दिया था
न कभी उन्हें किसी से शिकायत करते सुना
न कभी किसी से शिकवा
बस आस का एक दिया था
जो हर पल वो अपन े हृदय मे ं जलाए रहती थी
साधारण नही ं एक असाधारण महिला
वो मेरी माँ थी, देव लोक से आई थी
‘‘जय माँ’’

माँ की
श्रद्धा सुमन
सुपुत्री- शोभा चाँदला
की ओर से

 

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