नषे में दौड़ने से पहले ही हाँफ जाओगे

उन्तिश्ठत् जागृत।

जीवन जागने का चैतन्य होने का,
उँचा उठने का, उठ कर चलने का,
अग्नि की लौ की तरह, उँचा उठ ब्रहम को पाने का
‘स्व’ को ‘स्व’ की षक्तियों को जानने का नाम है।

भोर हो गई है। अब जाग जाओ।
जीवन निर्जीव रहकर, आँख मूँद सोने का,
मिट्टी के ढेले की तरह लुढ़कने का नाम नहीं,
लुढ़ककर पतन की खाई में जा गिरने का,
मानवीय मूल्यों , आदर्षों के देवालयों से फिसलने का नाम नहीं है।
जीवन रूकने का नहीं चरैवेति चरैवेति, गतिमान रहने का नाम है।

पर्वतों के षिखरों को,
सागर की गहराई को, गगन की उँचाई को,
तुम नषे में रहकर न पा सकोगे,
गहन सुरंगों के पार दिखती उजली मंजिलों को,
तुम मदहोष रहकर न पा सकोगे।

नषा छोड़कर, होष में रहकर ही अपने, अपनांे को, सपनों को पा सकोगे,
राश्ट्र को आज संकल्पित बलिश्ठ प्राण चाहिए।
निर्बल, निस्तेज, निराष भयभीत युवा नहीं,
श्री मोदी जी जैसे आदर्ष युगद्रश्टा राश्ट्र संत चाहिए।

उठो, जागो! हाई रहने का यदि शौक है,
तो उँचे लक्ष्य, उँचे आनन्द के स्त्रोत खोजो।
जीवन में संगीत, कला को सराहो,
सत्यम षिवम् सुन्दरम् के भाव को ह्रदय में उतारो, नषा छोड़ो !
उत्कृश्ट कर्म करके आत्मदीप बनके,
भारत माँ, देव, गुरजनों के कर्ज को उतारो।

स्वरचित कविता शोभा चाँदला
E-mail : shobhachandla@yahoo.com
Website : www.shobhachandla.com

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