श्री ‘माँ’

माँ मेरे लिए एक तीर्थ थी
उनके सानिध्य में एक सकून
एक शान्ति, एक चैन की अनुभूति होती थी
अंतिम दिनों मंे, भी (दया धर्म का मूल) है। दोहा
और अजब हैरान हँू भगवान तुझे कैसे रिझाऊँ मैं।
जैसे भजन सुनाना नही ं भूलती थी
सारे धर्म-ग्रन्थ चाहे उन्होने न पढ़े हो,
किन्त ु सच्चाई और धर्म को उन्होंने जिया था,
वो अम्बालिका, एक शक्ति का रूप थी
वो मेरी माँ थी, देवलोक से आई थी
आज 91 वर्ष के संघर्षमय जीवन का
एक छोटा सा काल खंड, महाकाल के
महासागर में विसर्जित हो गया
और वो मेरी स्वर्णमयो माँ, सूक्ष्म तत्वों में
आकाश की किरणों के बीच विलीन हो गई
जन्म-मरण के चक्रव्यूह से मुक्त हो गई
विशाल हृदय की देवी विशालता में समा गई
माँ तुम जहाँ भी रहो, परम आनन्द से रहो
ईश्वर के चरणों में तुम्हे स्थान मिले
बहुत थक गई हो, अब प्रभु की छाया में आनन्दमय विश्राम लो
हम यही से आसमान के सबके चमकते हुए
सितारे की द ेख संतोष कर लेगे ं
अश्रुओं से भीगी आँखों से यही कहेंगे- करोड़ों में एक वो मेरी माँ थी,
देव लोक से आई थी
अश्रुपूर्ण नयनों से भावभीनी, विदाई
। अभार ’माँ’

सुपुत्री- शोभा चाँदला
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श्रद्धा ंजली समारा ेह मे ं समर्पित किए ये भाव मेरे अंतःकरण की अभिव्यक्ति है। 30 जनवरी 2013

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