स्वच्छ-भारत

। ऊँ जय भारत ऊँ ।

स्वच्छ-भारत

टाइम्स नाउ नामक अंग्रेजी न्यूज के साक्षात्कार में माननीय प्रधानमंत्री
भ्रष्टाचार से जुडे़ एक सवाल के जवाब
में बोले –

’’बहुत सी ऐसी चीजे होती है जो
दिखाई नहीं देती हैं। कोई इस
चीज को नहीं समझ सकता कि मैं किस तरह
की गंदगी का सामनाकर रहा हूँ, जो काम
करता है, उसी को पता है कि कितनी
गन्दगी है, इसके पीछे कई तरह की ताकते
हैं।’’

ये शब्द मोदी जी के भीतर छिपी पीड़ा
को व्यक्त करते हैं, हर स्तर की गन्दगी
पिछली सरकारों से उन्हें विरासत में
मिली हैं। प्रधानमंत्री का पद संभालते
ही वे समझ गये थे कि यदि राष्ट्र को सशक्त, समर्थ और समृद्ध बनाना है तो
सर्वप्रथम इसे हर प्रकार की गन्दगी से मुक्त करना होगा। देश का विकास
स्वच्छ-भारत के साथ ही संभव है- ‘‘न गंदगी करेगें न करने देगें
का मंत्र’’ सबको देने के मकसद से पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने स्वतन्त्रता
दिवस के पुण्य अवसर पर लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने प्रथम
उद्बोधन/संदेश में देशवासियों को स्वच्छ भारत आन्दोलन के
साथ जुड़ने के लिए आहवन किया और राष्ट्र को हर गन्दगी, दुरितों से
मुक्त करने का संकल्प लिया। गाँधी जयन्ती के अवसर पर स्वयं झाडू. पकड कर
मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के पास सफाई अभियान का आरम्भ किया।
श्री मोदी जी ने स्वच्छता अभियान में शामिल होने के लिए नौ लोगों
को आमंत्रित किया और उनसे अनुरोध किया कि वे भी और नौ
व्यक्तियों को इस अभियान के साथ जोड़े। आज यह एक महा जन-आन्दोलन

2
बन चुका हैं। करोड़ो देशवासियों के मन में स्वच्छता व श्रम के प्रति
सम्मान जागा है, मोदी जी के व्यक्तित्व व प्रेरणादायक शब्दों से प्रेरित
होकर अम्बानी जी, सचिन तेंदुलकर जी, अमिताभ बच्चन जी जैसे दिग्गजों ने
भी हाथ में झाड़ू पकड़ने में संकोच नहीं किया। आम जनता ने
भी स्वच्छ-भारत के इस मिशन के संकल्प पत्रों पर अपने हस्ताक्षर किये। इसके
अतिरिक्त खुले में शौच को लेकर चलाए गए अभियान भी आज सफलताओं पर
सफलताऐं हासिल कर रहे हैं 70 वर्षो में किसी ने नहीं सोचा जो इस
स्वच्छता के पुजारी ने सोचा, नतीजा ये हुआ कि तीन वर्षो में हजारों
गाँव आज खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, अनेकों
शौचालय योजनाऐं शुरू की गई हैं। वाराणसी हो, हरिद्वार हो, गंगा
नदी की सफाई का कार्य भी जोरो पर है। अस्सी घाट हो या हर की
पौड़ी सब और सफाई दृष्टिगोचर होती है। लोगों में सफाई के
प्रति चेतना हागी है।
सचमुच यदि देखा जाये तो ईश्वरत्व के बाद यदि किसी की महत्वता है तो वह
स्वच्छता की ही है। क्योंकि ईश्वर समस्त शुभ का प्रतीक है और जहां
भी शुभत्व है वहां हमें पवित्रय का बोध होता है। पवित्रय और
शुभत्व दोनो साथ साथ चलते हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं
की जा सकती। गन्दगी, व्यक्ति, समाज के तेज खोज व वर्चस्व को सोख लेती
है। जीवन के तत्व को नष्ट कर देती है। स्वच्छ तलवार की धार ही पैनी
होती है, स्वच्छ दर्पण में ही दर्शन होता है, निर्मल जल ही जीवनप्रद
होता है। पवित्र पावन में ही संजीवनी शक्ति होती है, स्वच्छ सदाचारी
जीवन में ही स्व-पर कल्याण हेाता है। इसी प्रकार राष्ट्र में शुभत्व का
आगमन, स्वच्छता से ही संभव है। फिर चाहे यज्ञ करना हो, पूजा, अर्चना
करना हो पहले जल छिड़क कर पवित्रीरिण किया जाता है, तभी ईश्वर प्रार्थना
सुनते हैं।
दार्शनिक सुकरात के पास एक शिष्य आत्मिक उन्नति का मार्ग पूछने आया, सुकरात
ने उसके बढ़े हुए नाखुन, मैले कुचैले कपड़े उसके उलझे हुए बाल
देखे और कहा शरीर के बाहर का अवरण स्वच्छ किये बिना आत्मिक उन्नति की
बात करना मूर्खता है, जाओ पहले नाखून काटो, बाल काटवाओ व स्नान
करके अपने आपको स्वच्छ करो।

3
हमारे शास्त्र कहते है- ‘‘शरीर माद्यं खलुधर्म साधनम्’’ शरीर धर्म का
पहला साधन है इसके साथ-साथ शास्त्रों में अंतकरण की पवित्रता की भी
महत्वता के लिए भी प्रार्थना की गई है।
‘‘पुनन्तु मा देव जनः पुनन्तु मन वो धिया, पुनन्तु विशवा भूतानि
पवमानः पुनातु मा’’ इस मन्त्र में ईश्वर से मन की, बुद्धि की पवित्रता के लिए
प्रार्थना की गई है। जीवन की यात्रा में बुद्धि की पवित्रता का सर्व प्रमुख
स्थान है, बुद्धि के पवित्र होने से सम्पूर्ण जीवन पवित्र हो जाता है। उसके
प्रभाव से विचार, दृष्टि, श्रवन, वचन, गति, चेष्टा सब पवित्र हो जाता है। इस
पवित्रता का महत्व समझाते हुए ही हमारे वेदाचार्यो ने जन्म से लेकर मृत्यु
पर्यन्त सोलह संस्कारों का प्रावधान रखा है। इस 16 संस्कारों के पीछे एक
पूरा एक विज्ञान, मनोविज्ञान है। हमारे ऋषिमुनी, संत जानते थे ‘‘जन्मना
जाएते शुद्धः संस्कारा दद्विज उच्चते’’ अर्थात जन्म से सभी शुद्ध होते हैं,
संस्कारों के द्वारा उन्हें द्विज बनाया जाता है। बच्चा जन्म के साथ पिछले
जन्मों के संस्कारो, वृतियाँ साथ लेकर आता है। जो अवचेतन व अचेतन मन
में घर बनाये रहते हैं। उनकी शुद्धि करना आवश्यक है। संस्कार शब्द का
अर्थ संवारना, शुद्धि, परिष्कार से लिया जाता है। श्री अरविन्द ने मनुष्य को दो
तिहाई पशु प्रवृतियों को लेकर आया जीवधारी माना है। इन पशु
प्रवृतियों पर कैसे अंकुश लगाया जाए, हमारे शास्त्रों ने इसपर बहुत
विस्तारपूर्वक समझाया गया है। योगपद्ध्ति, संस्कारों से जीवन को परिष्कृत व
उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। इस विषय में पूरे विश्व में जितना योगदान
भारत का है शायद ही किसी राष्ट्र का होगा। यहाँ के ऋषियों, मुनियों
व संतो ने बताया है कि जीवन जीने की कला क्या है?
आज के समय में मोदी जी का पवित्र, दागरहित व स्वच्छ जीवन हमारी पीढ़ी के लिए एक
अनन्य उदाहरण है। सदियों के पश्चात् एक साफ- सुथरी छवि का राष्ट्रप्रणेता,
कर्णधार, युगपरिवर्तन पुरोधा एक रोल माॅडल के रूप में सामने है, जो भारत को
हर प्रकार की गन्दगी से, सदियों से चली आ रही कुरीतियों, जातिवाद, असमानताओं,
कुंठाओ, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की दिशा में तेजी से बढ़
रहे हैं। नीचे लिखी एक कहानी के संत जैसे हैं हमारे प्रधानमंत्री माननीय
मोदी जी ‘‘एक संत ने जिस सराय के एक कमरे में प्रवेश किया और उसे बहुत गन्दा पाया
उनके मुख से निकला कितने गन्दे यात्री यहाँ पर ठहर कर गए हैं – उन्होंने उसे
शुद्ध किया और हर वस्तु को व्यवस्थित तरीके से रखा, इस विशेष स्वच्छता के कार्य
को देखते हुए सराय के प्रबन्धक ने हँस कर पूछा ‘‘कुछ दिन बाद तो तुम यहाँ से
चले जाओगे तो क्यों इसे इतना शुद्ध करके जा रहे हो तो संत बोला ताकि हमारे

4
पश्चात् उसमें अनुगमन करने वाले यात्री कहें ‘‘कितना सुन्दर यात्री यहाँ ठहर कर गया
है, कमरे को कितना स्वच्छ छोड़कर गया है’’।
वैसे ही संत हमारे राष्ट्रसंत, राष्ट्रप्रेमी मोदी जी है जो कि नई पीढ़ी के लिए एक
मिसाल हैं। ‘‘न गन्दगी करूँगा न करने दूँगा ’’ ‘‘न खाउँगा न खाने दूँगा’’
जैसे वाक्यो की उद्घोषणा करने वाले युगप्रणेता, परिवर्तन के पुरोधा, राष्ट्र
के अवांछनीय व अपराधी तत्वों की भी सफाई कर रहे हैं उनका कहना है कि
भारत एक उत्कृष्ट सभ्यता का प्रतिनिधि तभी बन पायेगा जब भारत स्वच्छ होगा।
आओ हम सब मिलकर उनके स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करें और एक स्वर्णीम
भविष्य की आशा करें।

।। जय भारत ।।

शोभा चाँदला
ठसवह दृ ेीवइींबींदकसंण्बवउ
म.उंपस . नजजतंेींकं9971/हउंपसण्बवउ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *